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कैसी विडम्बना है कि हम अपने
आप को विकसित और सभ्य
समाज का नागरिक तो मानते
हैं परन्तु हम कितने
संवेदनशून्य होते जा
रहे है, यह चिन्तन नहीं
करते| हम जन्म से लेकर
मृत्युपर्यन्त
प्रकृति से अनवरत्
लेते ही रहते हैं परन्तु
हम लौटाते क्या है, यह
विचारणीय है ? हम शुद्ध
हवा को ग्रहण कर
प्रकृति में वापिस उसे
प्रदूषित रुप में
लौटाते हैं| शुद्ध जल
ग्रहण कर उसे तालाब और
नदियों में प्रदूषित जल
के रुप में लौटाते हैं|
स्वास्थ्यवर्धक अच्छी-अच्छी
वनस्पतियों को अपने
आहार के रुप में ग्रहण कर
प्रकृति में उसे
प्रदूषित मल-मूत्र के
रुप में वापस लौटाते हैं|
हम प्रकृति से सदैव
जीवनदायी तत्व ग्रहण
करते हैं परन्तु लौटाते
प्रदूषित रुप में है| हवा,
जल, वनस्पति, पृथ्वी,
पशु सम्पदा सबका हम दोहन
करते हैं| प्रकृति का
इनको पुर्नशोधन करने का
अपना विज्ञान है, परन्तु
उसका अपना एक समयचक्र भी
है| आज मनुष्य की लालसा
इतनी बढ़ गयी है उसे सारी
पृथ्वी भी छोटी मालूम
होने लगी है| विश्वगुरु
रवीन्द्रनाथ टैगोर के
शब्दों में - "जब मैं
छोटा था तो मेरे लिए
पालना भी बहुत बडा़ था और
अब, जब मैं बडा़ हो गया
हूँ तो यह पृथ्वी भी
छोटी मालूम पड़ती हैं|" हमारे
सभ्य और सुसंस्कारित
होने की पहिचान इस बात से
होती है कि हम प्रकृति
को, समाज को, सृष्टि को,
बदले में कितना-क्या और
किस रुप लौटाते हैं? कहने
को तो मनुष्य प्रकृति
का सर्वाधिक विकसित
बुद्धि वाला जीव माना
जाता है परन्तु
वर्त्तमान भौतिकवादी
मानव को देखकर इस पर शंका
करने की बहुत जगह है|
दुःखद तथ्य तो यह है कि
आज विनाश को ही विकास का
नाम दे दिया गया है|
प्रकृति के अंधाधुन्ध
दोहन की प्रक्रिया में
हम अपनी भावी पीढी को
क्या विरासत में देने जा
रहे हैं, इस पर आज के मानव
को सोचने की फुर्सत ही
नहीं है| हम भारतवर्ष की
ही बात करें| 15 अगस्त 1947 को
अंग्रेजों की दासता से
हमें मुक्ति मिली| भारत
और पाकिस्तान दो
स्वतन्त्र राष्ट्र बनें|
आज अगर हम किसी से पूछें
कि भारत की आबादी कितनी
है, तो उत्तर मिलेगा कि 110
करोड़; परन्तु हम भूल
जाते हैं कि यह तो मात्र
मानव आबादी है| क्या
करोडो़ अरबों पशु-पक्षी
इस भारत भू-भाग में नहीं
रहते? क्या भारत के
प्राकृतिक संसाधनों पर,
इस देश की जमीन पर इनका
कोई अधिकार नहीं है? क्या
मानव अपने आपको उनका
नियन्ता मानने की गलती
नहीं कर रहा है? क्या
ईश्वरीय कार्यक्षेत्र
में हस्तक्षेप नहीं है?
भारत सरकार के ही जूलोजिकल
सर्वे आफ इन्डिया की
रिपोर्ट के अनुसार
भारतवर्ष में 89317 से अधिक
जीव-जन्तुओं की
प्रजातियां रहती है, जो
मुख्य रुप से इस प्रकार है-
ANTHROPODA मनुष्य आकृति वाली प्रजाति 68389,
MOLLUSCA 5070 AMPHIBIAN जल और थल दोनों में
रहने वाली 209, PROTISTA
प्रजाति की 2577
MAMMALIAN स्तनपाई प्रजाति 390,
REPTILIAN सर्पो की प्रजाति 456
PROTOCHORDATA प्रजाति 119, PISCES
मछली प्रजाति 2546
INVERTEBRATES अन्य छोटी
प्रजातियां 8329, AVES
पक्षी प्रजाति 1232
इस प्रकार कुल 89317 प्रकार
की ज्ञात प्रजातियां
भारत में रहती हैं|
इसी
प्रकार वोटानिकल सर्वे
आफ इन्डिया के अनुसार
भारतवर्ष में
वनस्पतियों की 46000
प्रजातियों की तो पहचान
की जा चुकी है| चौरासी
लाख योनियों में
जीवनराशियां पाई जाती
है, यह हम सब जानते हैं| ये
तो उनमें से मात्र कुछ
जीवराशियों की पहचान है|
इस प्रकार भारतवर्ष में
110 करोड़ मानव आबादी के
साथ करोडो़ जलचर, नभचर और
थलचर जीव भी निवास करते
है और उन सबके प्रति भी
हमारा कुछ न कुछ कर्तव्य
बनता है| भारतीय संविधान
ने भी इसे नागरिकों का
मूलभूत कर्तव्य माना है|
हमें इस सूत्रवाक्य को
सदैव ध्यान रखना चाहिए
कि मदर नेचर कैन फीड द
नीड आफ एव्हरी वन, बट कैन
फीड द ग्रीड आफ नन|
अर्थात प्रकृति सबकी
जरुरतें पुरी कर सकती है
परन्तु लालसा किसी की
पूरी नहीं कर सकती| अतः
मानव को अनावश्यक लालसा
पर लगाम कसनी जरुरी है|
मनुष्य का शारीरिक गठन
प्राकृतिक तौर पर
शाकाहार के लिए बना है|
यह सभ्य आहार है,
प्राकृतिक है और
स्वास्थ्य के नियमों के
अनुकूल है| फिर भी आज का
सभ्य कहा जाने वाला
मनुष्य हिंसक, रोगवर्धक,
अप्राकृतिक एवं
अमानवीय मांसाहार को
अपनाये हुए हैं, यह दुःखद
है| असभ्य और अशिक्षित
व्यक्ति यदि मांसाहार
करता है तो बात समझ में
आती है, परन्तु यहां तो
विडम्बना यह है कि सभ्य
और शिक्षित समाज भी इस
तथ्य की अनदेखी करने की
गलती कर रहा है| अमेरीका
के प्रसिद्ध लेखक जान
राबिन्स ने अपनी विश्व
प्रसिद्ध पुस्तक डाईट
फार ए न्यू अमेरीका मे
यह निष्कर्ष निरुपित
किया है कि विश्व की सभी
विकसित सभ्यताओं के
विनाश के मूल में वहां के
निवासियों द्वारा मांस
भक्षण करना प्रमुख कारण
रहा है| कहीं भारतीय सभ्यता
के मामले में हम उसी
इतिहास की पुनराव्रति
का अपराध तो नहीं कर रहे
हैं? आईये, हम संकल्प लें
कि हम शाकाहारी रहेंगे
तथा शाकाहार के व्यापक
प्रचार-प्रसार हेतु
सदैव संकल्पित रहेगे| |
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